बिहार की महाराजगंज लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के जनार्दन सिंह सिग्रीवाल और कांग्रेस के आकाश सिंह के बीच मुकाबला है। सिग्रीवाल जीते तो यह उनकी जीत की हैट्रिक होगी। आकाश जीते तो महागठबंधन को 11 साल के बाद यहां कोई जीत मिलेगी। कांग्रेस उम्मीदवार के कारण इस बार महाराजगंज का समीकरण पूरी तरह बदला हुआ है। पूरे इलाके में नई जातीय गोलबंदी और ध्रुवीकरण आकार ले रहा है। यही कारण है कि एनडीए को आधार वोट में सेंधमारी का डर सता रहा है तो महागठबंधन को कुछ खास वोटों के नुकसान का। एनडीए को मोदी मैजिक का भरोसा है तो महागठबंधन को नए समीकरण से मैदान मारने का। पर इतना तय है कि इस बार नए समीकरण बने और बनाए जाएंगे। अलबत्ता, वोटरों की चुप्पी और नई गोलबंदी के बीच परेशान उम्मीदवार अपने आधार वोटों को बचाने और अपने-अपने समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं।
महाराजगंज के किसी हिस्से में जाइए, अलग-अलग मिजाज के वोटरों से सामना होता है। चंचोड़ा के बाबूलाल कहते हैं, लोग जाति को लेकर एकजुट हो रहे हैं। लेकिन कई लोगों के लिए महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है। रामजी का कहना है कि रोजगार अहम मुद्दा है। इन्दौली के ब्रज भूषण के लिए उम्मीदवार अहम है। कहते हैं-जब मन आए कोई कहीं से खड़ा हो जाए, उचित है क्या? मधु मालती कहती हैं, सांसद सुख-दुख में साथ खड़ा रहने वाला हो। बनपुरा के धनंजय सिंह को दुनिया में भारत का बढ़ता नाम अच्छा लगता है। तो राकेश सिंह राम मंदिर बनने से खुश हैं। मांझी के बुद्धन बाबू का मानना है कि एक ही व्यक्ति को बराबर जिताने से क्षेत्र को नुकसान होता है। रोटी की तरह उसे पलटते रहना चाहिए। यही बात सरकार पर भी लागू होती है।

पंचुआ के संजय के लिए राष्ट्रवाद सबसे जरूरी है। कहते हैं, देश रहेगा तभी सब रहेंगे। एकमा के विजय कुमार के लिए रोजगार और महंगाई को नजर अंदाज कर पाना मुश्किल है। तमनपुरा के प्रबोध के अनुसार रोजगार को जान बूझकर प्रचारित किया जा रहा है, जबकि देश में कितना रोजगार दिया गया है। देवरिया के राधेश्याम कुमार को आरक्षण से छेड़छाड़ का भय है, तो सुरेंद्र जी को पीओके जैसे मुद्दे सिर्फ राजनीतिक लगते हैं। कहते हैं, यह वोट के लिए ध्यान भटकाने की साजिश है। अपना किया काम तो बता नहीं रहे। बनियापुर के अभिषेक कहते हैं, हर वर्ग के लिए काम हुआ है। राजीव सिंह कहते हैं, जितना काम इस सरकार में हुआ, कोई सोच नहीं सकता।
खामोशी की चादर ओढ़े महाराजगंज की जनता चुनाव को लेकर कोई खास चर्चा करती नहीं दिखती। बहुत कुरेदने पर लोग चुनाव पर बात तो करते हैं, पर राज नहीं खोलते। मानो, उन्हें परिणाम पहले से पता हो। पूरे लोकसभा क्षेत्र में अजीब सी राजनीतिक खामोशी है। यदा-कदा प्रचार गाड़ी सड़क पर दिखती भी है तो बगैर किसी शोर के चुपचाप गुजर जाती है। किसी-किसी गाड़ी से वोट देने की अपील जरूर की जाती है। पार्टी दफ्तर भी कहीं-कहीं नजर आते हैं। हालांकि इन दफ्तरों में कार्यकर्ता और नेता नदारद हैं।

पलायन और सिंचाई बड़ी समस्या
पलायन और खेती किसानी बड़ी समस्या है। रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग अन्य राज्यों को जा रहे हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जो बाहर गए तो फिर लौट कर नहीं आए। यहां सिंचाई के साधन कम हैं। बारिश पर निर्भरता बड़ी चुनौती है। ज्यादातर समय नहरें सूखी रह रहती है। नील गायों की बढ़ती संख्या भी खेती पर असर डालता है। पराली जलाने की घटना बढ़ती जा रही है। इसने एक नई समस्या को जन्म दे दिया है।
महाराजगंज में राजपूत और भूमिहारों का दबदबा
महाराजगंज से क्षत्रिय और भूमिहार समाज के ही सांसद चुनाव जीतते रहे हैं। 1957 के पहले चुनाव में क्षत्रिय महेंद्र नाथ सिंह को चुनाव जीतने का अवसर मिला तो अगली बार 1962 में भूमिहार समाज के कृष्णकांत सिंह लोकसभा पहुंचे। 2019 तक यही सिलसिला रहा। अब तक क्षत्रिय समाज के 10 और भूमिहार के तीन सांसद हुए। इस बार भी इन्हीं दोनों समाज के प्रत्याशियों के बीच मुकाबला है।
हैट्रिक की जुगत में सिग्रीवाल
आरएसएस से जुड़े रहे जनार्दन सिंह सिग्रीवाल ने पहला विधानसभा चुनाव 2000 में जीता था। इसके बाद 2014 और 2019 में महाराजगंज से विजयी होकर संसद पहुंचे। अब फिर से चुनावी मैदान में हैं। उनकी नजर हैट्रिक पर है।
फिर चुनावी मैदान में आकाश
आकाश सिंह बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश सिंह के बेटे हैं। 2019 में वह आरएलएसपी के टिकट पर पूर्वी चंपारण से लड़े थे। पर भाजपा के राधामोहन सिंह से हार गए। अब उन्हें महाराजगंज से कांग्रेस ने कैंडिडेट बनाया है।
सीवान और सारण जिले की 6 विधानसभा सीटें
महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र में छह विधानसभा सीटे हैं। इनमें दो सीवान जिले में और चार सारण के हिस्से में हैं। गोरेयाकोठी और तरैया विधानसभा सीट पर बीजेपी, एकमा एवं बनियापुर पर आरजेडी, महाराजगंज पर कांग्रेस और मांझी पर सीपीएम का कब्जा है।
