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लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाने वाले उम्मीदवारों की संख्या चुनाव दर चुनाव घट रही है। पिछले तीन दशकों में उम्मीदवारों की संख्या घटकर करीब आधी रह गई है। वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान देशभर में इनकी संख्या 13,952 थी, जो वर्ष 2019 के चुनाव में 8,054 हो गई। इसी अवधि में बिहार में उम्मीदवारों की संख्या 1448 से घटकर 626 पर पहुंच गई।
तीन दशक में बिहार में उम्मीदवारों की संख्या में 57 फीसदी की कमी आई है। निर्दलीय चुनाव लड़ने वालों की संख्या में भी पिछले तीन दशक में करीब पांच गुना की कमी आई है। 1996 के चुनाव में जहां बिहार में 1103 प्रत्याशी बतौर निर्दलीय मैदान में उतरे थे, वहीं 2019 में यह संख्या 230 रही। बताते चलें कि 1996 में एकीकृत बिहार में लोकसभा क्षेत्रों की संख्या 54 थी।
1996 के लोकसभा चुनाव में प्रति सीट पर चुनाव लड़ने वालों उम्मीदवारों की औसत संख्या 27 रही। 2019 के चुनाव में बिहार की 40 सीटों पर 626 और झारखंड की 14 सीटों पर 229 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। बीते लोस चुनाव में औसतन प्रति लोकसभा सीट पर उम्मीदवारों की संख्या 16 थी। फिर भी 1996 के मुकाबले 41 प्रतिशत कम उम्मीदवार थे। इसके पहले भी वर्ष 1991 में बिहार की 54 लोकसभा सीटों पर 1214 उम्मीदवार उतरे थे। उस चुनाव में देशभर में उम्मीदवारों की कुल संख्या 8 हजार 668 थी। इसमें दलीय और निर्दलीय दोनों कोटि के उम्मीदवार थे। इन दोनों चुनावों के बाद उम्मीदवारों की संख्या कम होने लगी।
वर्ष 1991 और 1996 के समय देश की राजनीति उथल-पुथल भरा था। 1989 में बीपी सिंह ने वाम दलों के समर्थन से सरकार बनाई। लेकिन, दो साल के भीतर ही 1991 में लोकसभा चुनाव की नौबत आ गई। वर्ष 1996 आते-आते भाजपा ने देश भर में अपनी पैठ बढ़ाई। 1996 में भाजपा को सर्वाधिक सीटें तो मिलीं, पर त्रिशंकु संसद बनी। राष्ट्रीय राजनीति का असर एकीकृत बिहार की चुनावी राजनीति पर भी दिखा। अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में राजनीति से जुड़े लोगों को अपने-अपने क्षेत्र से जीत की संभावना दिखने लगी थी। दलों से जिन्हें टिकट नहीं मिला, वे निर्दलीय चुनाव लड़ गए। 1996 के चुनाव में बिहार में निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या 1103 रही। लेकिन, इसके बाद के चुनावों में यह संख्या घटने लगी। तब तक वोटों का ध्रुवीकरण दो पक्षों में होने का ट्रेंड बढ़ गया था। बिहार में 2004 के चुनाव में 462 और 2009 के चुनाव में 672 उम्मीदवार (दलीय व निर्दलीय दोनों मिलाकर) मैदान में उतरे। 2014 में यह संख्या 607 रही। 2019 में 626 हो गई।
निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या कम होने की बड़ी वजह बढ़ता चुनाव खर्च है। नेताओं का कहना है कि पहले की तुलना में अब चुनाव प्रचार के लिए काफी पैसे खर्च करने होते हैं। पहले की तरह अब कार्यकर्ता भी प्रतिबद्ध नहीं रह गए हैं। ऐसे में जब तक किसी दल की ओर से टिकट नहीं मिलता, लोकसभा चुनाव में जीत की संभावना नहीं रहती।
